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शक्ति के लिए देवी आराधना की सुगमता का कारण माँ की करुणा,दया,स्नेह का भाव किसी भी भक्त पर सहेज ही हो जाता है।ये कभी भी अपने बचे को किसी भी तरह से अक्षम या दुखी नही देख सकती।उनका आशीर्वाद भी इस तरह मिलता है।जिससे साधक को किसी अन्य की सहायता नहीं पड़ती ।वह सवयं सर्वशक्तिमान हो जाता है।

इनकी प्रसंता के लिए कभी भी उपासना की जा सकती है।क्योंकि शास्त्रज्ञा में चंडी हवन के लिए किसी भी मुहूर्त की अनिवार्यता नहीं है ।नवरात्रे में इसका विशेष महतव है।इस समय के तप का फल कई गुणा व शीघ्र मिलता है।सहस्त्रनाम में देवी क एक हज़ार नामो की सूची है।
माँ दुर्गा की आराधना साल में दो बार बेहद महतवपूर्ण माने जाते है। यह दो समय होते है पहले चैत्र नवरात्री और शारदीय नवरात्री ।चैत्र नवरात्री चैत्र के महीने में मनाया जाता है। जबकि शारदीय नवरात्री आश्विन माह में मनाया जाता है।इन दिनों देवी के निमित व्रत रखने का विधान है।कुछ लोग केवल लौंंग का जोड़ा खाकर ही व्रत करते है।जबकि कुछ लोग फलाहारी व्रत रखते है।यदि 9 दिन व्रत रखना संभव हो तो पहले और अन्तिम नवरात्र का व्रत रखना चाहिए।इसका समापन कन्याओ का भोजन करवाकर उन्हें वस्त्र ,पैसे आदि भेंट करते है।

इन दिनों में मंदिर जाये या नहीं घर पर एक निश्चित स्थान पर पूजा करने का शास्त्रों में विधान है।पूजा स्थल का यदी फर्श कच्चा है तो गोबर से लीप कर और अगर पका है तोह पानी से धोकर वहा लकड़ी का एक पटरा रखा जाता है और घडे या लौटे में जल भर कर कलश की स्थावना की जाती है।सिंहवाहनी भगवती दुर्गा का चित्र पटरा पर रखकर गणेश जी की मूर्ति मोली या फिर पीत रंग का कपडा लपेटकर पटरे पर रखा जाता है।कलश ओअर नारियल को लाल कपडे से लपेटकर रखा जाता है।इस तरह 8 या 9 दिन पूजा के बाद महालक्ष्मी का रामनवमी को पूजा कर कन्या पूजन भी किया जाता है।कई लोग दुर्गा सप्तशती पाठ का विधान के अनुसार पूजा के बाद हवन भी करते है।ब्रह्म पुराण के अनुसार आज इसी दिन ब्रह्मा जी की पूजा आराधना का शास्त्रीय विधान है।

नवरात्रि पर्व पर माता की आराधना के साथ ही व्रत उपवास का विशेष महत्व है।जिस प्रकार नवरात्रे के 9 दिन मा दुर्गा के अलग अलग रूप की .......

1.शैलपुत्री
2.ब्रह्मचारिणी
3.चंद्रघंटा
4.कुष्मांडा
5.सकन्द
6.कात्यायिनी
7.कालरात्रि
8.महागौरी
9.सिद्धदात्री

जनमानस में माँ भगवती से जुडी नवरात्रो ई कई कथाये प्रचलित है।शरद ऋतू और वसंत ऋतू के मिलने के कारण शारीरिक एवं मानसिक कष्ट लोगो को ज्यादा झेलने पढ़ते है।इस दौरान सब्ज़ियों एवं फलों की उपज में भी कमी आ जाती है।साथ ही दूषित वायु एवं जल के कारण कई प्रकार के रोग उत्पन हो जाते है।ऐसे मौसम में नवरात्रो में रखे उपवास एवं खानपान के संयम का फल चिरगामी होता है।नवरात्रो के तहत सूर्योदय से पूर्व उठकर अपनी दोनों हथेलियो को देखते हुए निम्न मंत्र का जाप करना चाहिए-

मंत्र 
कराग्रे वसते लक्ष्मी: कर मध्ये सरस्वती
कर मूले स्थितो ब्रह्म प्रभाते कर दर्शनम्।

इस मंत्र से अभिप्राय है की हथेली के अग्र भाग में लक्ष्मी मध्य में सरस्वती एवं मूल भाग में ब्रह्मा जी निवास करते है।इसके बाद ज़मीन पर पैर रखने की मज़बूरी के लिए उनसे क्षमा मांगे।उसके बाद स्नान करके सूर्य नमस्कार करे।इसके बाद पूजा करते हुए सबसे पहले गणेश जी की वंदना की जानी चाहिए।इन दिनों खेत्री बोने की प्रथा भी है।जिसके लिए मिटटी का स्वछ बर्तन लेकर उसमे मिटटी एवं रेत के मिश्रण में जौ बोने चाहिए।यह व्रत धन धान्य,सुख संतान की वृद्धि करता है।आयु आरोग्य वरदान करता है।