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विवाह एक महत्वपूर्ण "संस्कार" 
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विवाह बाधा होगी दूर.... करें सार्थक प्रयास/उपाय 
जानें कैसे.....? ध्यान से पढ़ें यह लेख ..

सनातन धर्म संस्कृति में जन्म मिलना मानव के लिए एक अनुपम वरदान है , जहाँ मनुष्य प्रारब्ध का भोग और वर्तमान कर्म संशोधित कर अपना जीवन उर्ध्वगामी बना पता है ।
वैदिक पद्धति से जन्म जन्मांतरों के कुसंस्कारों को संवर्द्धित, परिस्कृत करने का सुअवसर एक मात्र सनातन धर्म में ही प्राप्त होता है ।

संस्कार' शब्द् 'सम्' उपसर्गपूर्वक 'कृञ्' धातु में 'घञ्' प्रत्यय लगाने पर 'संपरिभ्यां करोतौ भूषणे' इस पाणिनीय सूत्र से भूषण अर्थ में 'सुट्' करने पर सिद्ध होता है । इसका अर्थ है—संस्करण, परिष्करण, विमलीकरण तथा विशुद्धिकरण आदि

जिस प्रकार किसी मलिन वस्तु को धो-पोंछकर शुद्ध-पवित्र बना लिया जाता है अथवा जैसे सुवर्ण को आग में तपाकर उसकी मिलावट को दूर किया जाता है और उसके मल जल जाने पर सुवर्ण विशुद्ध रूप में चमकने लगता है, ठीक उसी प्रकार से संस्कारों के द्वारा जीव के जन्म-जन्मान्तरों से संचित मलरूप निकृष्ट कर्म-संस्कारों का भी दूरीकरण किया जाता है।

जन्मनां जायते शूद्र: संस्काराद् द्विज उच्यते ।
वेद पाठात् भवेद् विप्र: ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः ।।

यही कारण है कि हमारे सनातन धर्म में बालक के गर्भ में आने से लेकर जन्म लेने तक और फिर बूढ़े होकर मरने तक संस्कार किये जाते हैं । जैसा कि शास्त्र में कहा गया है—

ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रा वर्णास्त्वाद्यास्त्रयो द्विजाः।
निषेकाद्याः श्मशानान्तास्तेषां वै मन्त्रतः क्रियाः।।

अतः "व्यास स्मृति" में सोलह संस्कारों के नाम इस प्रकार हैं

1. गर्भाधान संस्कार
2. पुंसवन संस्कार
3. सीमन्तोन्नयन संस्कार
4. जातकर्म संस्कार
5. नामकरण संस्कार
6. निष्क्रमण संस्कार
7. अन्नप्राशन संस्कार
8. मुंडन/चूड़ाकर्म संस्कार
9. विद्यारम्भ संस्कार
10. कर्णवेध संस्कार
11. यज्ञोपवीत संस्कार
12. वेदारम्भ / विद्यारम्भ संस्कार
13. केशान्त संस्कार
14. समावर्तन संस्कार
15. विवाह संस्कार
16.अन्त्येष्टि संस्कार/श्राद्ध संस्कार

इन संस्कारों का व्यास स्मृति एवं मनुस्मृति के विभिन्न श्लाकों में महत्त्वपूर्ण ढंग से वर्णन किया गया है । 
अतः इन संस्कारों का अनुष्ठान नितान्त आवश्यक है ।इन संस्कारों के करने का अभिप्राय यह है कि जीव न जाने कितने जन्मों से किन-किन योनियों में अर्थात पशु, पक्षी, कीट, पतंग, सरीसृप, स्थावर, जंगम, जलचर, थलचर, नभचर एवं मनुष्य आदि योनियों में भटकते हुए किस-किस प्रकार के निकृष्टतम कर्म-संस्कारों को बटोरकर साथ में ले आते हैं, इसका उन्हें पता नहीं चलता है ।

इन्हीं कर्म संस्कारों को संवर्द्धित करके या क्षीण करके उनके स्थान में अच्छे और नये संस्कारों को भर देना या उत्पन्न कर देना ही इन संस्कारों का अभिप्राय है।

संस्कारों से ही बालक सदगुणी, उच्च विचारवान्, सदाचारी, सत्कर्मपरायण, आदर्शपूर्ण, साहसी एवं संयमी बनता है ।
बालक के ऐसा बनने पर देश तथा समाज भी ऐसा ही बनता है, किन्तु बालक के संस्कारहीन होने से वह देश को बिगाड़ेगा, अर्थात अधर्माचरणवाला, नास्तिक तथा देशद्रोही बनकर समाज को दूषित करेगा । 
जिसके परिणामस्वरूप वह व्यभिचार, चोरी, डकैती, आतंकवाद, कलह, वैर तथा युद्ध जैसी परिस्थिति उपस्थित कर सकता है । इसलिये हिन्दू समाज के बालकों का जन्म के पूर्व ही संस्कार कराने का विधान है ।

किन्तु दुर्भाग्यवश आधुनिक जीवन शैली ने अधिकतर हिन्दू वर्ग को वांछाकल्पतरु स्वरूप दिव्य सनातन धर्म के संस्कारों की महिमा से दूर कर दिया है । जिससे समाज में धर्मनिरपेक्षता का कैंसर फैल रहा है । जिसका सीधा लाभ म्लेच्छ आदि विधर्मियों को मिल रहा है । जो भारतीय संस्कृति के लिए अत्यंत चिंतनीय है ।

इसका प्रत्यक्ष उदाहरण धर्मनिरपेक्षता का चौला ओढ़े बेलगाम भारतीय मिडिया में भी देखने को मिलता है , खुद हिन्दू पत्रकार अपने चैनलों में बैठकर भारतीय संस्कृति ,गौ, गंगा, ब्राह्मण साधु, सन्यासी आदि का निरंतर दुःखद अपमान करते हुए स्वयं को बहुत पढ़ें लिखे आधुनिक सेक्युलर समझ फूले नहीं समाते हैं ।

आधुनिक शिक्षा एवं संस्कारों के अभाव 
के कारण हिन्दू धर्म गुरुओं से वार्ता करने का सलीका तक इनमें नहीं होता । किसी की एक कमी हाथ लगने पर उन्हें ये चौराहे पर नंगा करने से नहीं चूकते ।दुर्भाग्यवश ये सब संस्कारों के अभाव का प्रति फल है ।

आइये अब विवाह की बात करते हैं ---

विवाह
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मनुस्मृति में आठ प्रकार के विवाहों का वर्णन है ।

ब्राह्मोदैवस्तथैवार्षः प्रजापत्यस्तथा Sसुरः ।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोSधमः ।।

1-ब्राह्म विवाह 
(यथाशक्ति अलंकृत कन्या का पिता द्वारा स्वजनों की उपस्थिति में वैदिक विधि से अग्नि प्रदक्षिणा करवाकर श्रेष्ठ वर को दान करना )

2- दैव विवाह
( विद्वान चरित्रवान युवक को सादर निमंत्रित कर यज्ञ में ऋत्विज से अनुष्ठान पूर्वक अलंकृत कन्या युवक को प्रदान करना )

3-आर्ष विवाह 
( विद्वान चरित्रवान युवक वरण करके दो गाय बैल लेकर विवाह हेतु सुसज्जित कन्या सौंपना )

4- प्रजापत्य विवाह
( धर्माचरण हेतु अलंकृत कन्या वर को सौंपना जैसे ऋषि मुनियों को विवाह हेतु कन्या देना आदि )

5- गांधर्व /स्वयंवर विवाह 
( कन्या व युवक द्वारा एक दुसरे को पसन्द कर अपनी इच्छा से विवाह करना जिसे प्रेम विवाह भी कहते हैं )

6-आसुरी विवाह
( वर पक्ष से धन द्रव्य लेकर विवाह हेतु कन्या देना)

7-राक्षसी विवाह
( युद्ध आदि में कन्या को जीत कर विवाह करना)

8- पैशाच विवाह ( छल कपट पूर्वक कन्या से जबरदस्ती विवाह करना )

वर्तमान समय में गन्धर्व (प्रेम) विवाह और ब्राह्म विवाह प्रचलित हैं ।
सुखद दाम्पत्य सुख व देव ,ऋषि, भूत, पितृ, व मनुष्य आदि पांचों ऋणों की निवृत्ति तथा धर्म -अर्थ- काम- मोक्ष चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति हेतु आजकल मुख्यतः ब्राह्म विवाह शुद्ध वैदिक विधि से सम्पन्न करना श्रेष्ठ रहता है ।

किन्तु यहाँ भी आधुनिक विचारधारा से ग्रसित कुछ हिन्दू वर्ग ने ऐसे दिव्य विवाह महायज्ञों की पवित्रता महत्ता को डीजे ,फोटो, वीडियो , नाच शराब, मांस आदि के जश्न तक ही सीमित रख छोड़ा है । 
कई जगहों पर तो विवाह की वेदी होटल के बाहर एक कोने पर उपेक्षित सी बनी होती है जो खाना पूर्ती जैसी ही लगती है । उसमें भी विधि से विवाह संस्कार संपन्न करवाने का समय उन तथाकथित अभिजात्य वर्ग के पास नहीं होता ।

विवाह मंडप में बैठने से पूर्व ही पंडित जी को कम से कम समय में फेरे करवा लेने का आदेश प्रसारित कर देते हैं । 
संस्कारों के महत्व व ज्ञान के अभाव के कारण सनातन संस्कृति की इतनी दयनीय अवस्था सनातनियों के ही हाथों एक दुःखद विडम्बना बन गयी है । 
परिणाम स्वरूप आज वैवाहिक जीवन में बढ़ती कलुषिता व अस्थिरता है ।
और भी अनेक दुष्परिणाम घटित होते हैं, किन्तु कोई गंभीरता से नहीं लेता । इन गंभीर विषयों को लेकर हिन्दू समाज को जागरूक हो जाना चाहिए ।
मन मर्जी से नहीं चलना चाहिये । इतिहास साक्षी है जो भी अपनी धर्म संस्कृति से विमुख हुआ है , वे विधर्मियों के ही ग्रास बने हैं ।

यह सूत्र याद रखें "धर्मो रक्षति रक्षितः" हम धर्म संस्कृति का सही पालन करेंगे तो धर्म हमारी रक्षा करेगा । वृक्ष को नियमित खाद खुराक दोगे तभी उससे फल प्राप्त हो सकेंगे ।
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आपकी सेवा में हमारा छोटा सा प्रयास 
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अतः astrologersofindia के माध्यम से निवेदन है कि भारतीय संस्कृति में विवाह जन्म जन्मांतरों का सम्बन्ध माना गया है ।

पत्नी के रूप में जो स्त्री आप चुनते हैं वह " त्री" यानि तीन कुलों की मर्यादा(लज्जा) होती है ।

पिता की पु'त्री' , नाना की दौहि'त्री' और पति की 'स्त्री' ,

अतः इसका चुनाव अत्यंत सावधानी पूर्वक करें । और जीवन साथी के रूप में प्राप्त कर अपने अर्धांग रूप में मान्यता दें , जो अपने माता पिता आदि समस्त बंधु बांधवों , सखी सहेलियों को छोड़ कर आपकी जीवन संगनी बन आपके गृहस्थ जीवन को पूर्ण करती हैं उनका सदैव प्रेम सम्मान आदि के साथ व्यवस्थित संतुलन पूर्वक पालन करना चाहिए ।

माता पिता आदि समस्त पारिवारिक जनों के मध्य धर्म कर्तव्य सम्मत व्यवस्था संतुलन रखना चाहिये । जिससे गृहस्थ जीवन मधुर बने ।

शास्त्रों के अनुसार सम्बन्ध तो पूर्व निर्धारित होते हैं किन्तु हमें उस निर्धारित कन्या / वर की सही खोज करनी है ।

शास्त्रों के अनुसार दोनों की कुंडलियों का सही मिलान भी कराना चाहिए ।

और विशेष रूप से आपकी सही सुविधा हेतु हमने पौराणिक और वैज्ञानिक तकनीक के साथ आपके लिए कुंडली मिलान की ही तरह एक श्रेष्ठ पद्धति 
DMI Test 
खास लुधियाना में आपके लिए उपलब्ध करायी है । 
जिसका आप सही लाभ ले सकते हैं ।

उपयुक्त जीवन साथी की तलाश में भी आप हमारी websit ---www.weddingcares.com

में आप join कर सकते हैं । अब तक कई लोगों को मनोवांछित जीवन साथी की तलाश इस web site से पूर्ण हुयी है । 
हमें पूर्ण विश्वास है आपको भी अपने मनोवांछित जीवन साथी की शीघ्र ही प्राप्ति होगी ।
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विवाह बाधा निवारण हेतु कुछ अनुभूत प्रयोग इस प्रकार करें -
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1-शुक्ल वीरवार को एक पुराना खुला ताला सातबार बांये से दायें अपने ऊपर घुमाएं और अँधेरे में चुपचाप चौराहे में रख आएं । पीछे मुड़कर न देखें ।अपने विवाह योग खुलने की प्रार्थना करें ।

2-किसी नए विवाहित या विवाहिता से विवाह के दिन प्रयोग की गयी चीज जैसे कपड़ा चूड़ी विन्दी या मंगल स्नान की चौकी आदि मांग लें ।

3-गुरूवार को श्री विष्णु जी को सेहरा व कलगी चढ़ाएं और साथ में 5 लड्डू चढ़ाकर अपनी मनोकामना पूर्ती की कामना करें ।

4-जब भी वार्ता हेतु लड़के व लड़की वाले आएं उन्हें घर में इस तरह बिठाएँ जिससे उनका मुंह घर के भीतर की और रहे ।उन्हें द्वार न दिखाई दे ।

विशेष परामर्श हेतु कृपया समय लेकर मिलें ।

5- राम चरित मानस की इस चौपाई का नियमित 5 माला जप भी पति प्राप्ति कारक है ।

सुन सिय सत्य असीस हमारी ।
पूजहिं मन कामना तुम्हारी ।।