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क्या है रुद्राभिषेक और रुद्रार्चन प्रकार एवं क्या चढ़ा कर कौनसी कामना पूरी होगी ....अवश्य पढ़ें

श्रावण में शिव वास विचार नहीं रुद्राभिषेक से मनायें भोले नाथ को अवश्य पूर्ण होंगी कामनायें

" वेदः शिवः, शिवो वेदः" वेद ही शिव हैं और शिव ही वेद हैं अर्थात् शिव वेद स्वरूप हैं । शिव और रूद्र ब्रह्म के पर्यावाची हैं शब्द हैं । शिव को रूद्र इसलिए कहा जाता है क्योंकि शिव " रुत् अर्थात् दुःख को विनष्ट कर देते हैं ।
यथा -
"रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र:"

यानि भगवान शिव सभी दु:खों को नष्ट कर देते हैं । हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार हमारे द्वारा किए गए पाप ही हमारे दु:खों के कारण हैं ।

रुद्रार्चन और रुद्राभिषेक से हमारे कुंडली से पातक कर्म एवं महापातक भी जलकर भस्म हो जाते हैं और साधक में शिवत्व का उदय होता है तथा भगवान शिव का शुभाशीर्वाद भक्त को प्राप्त होता है । और उनके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं ।

ऐसा कहा जाता है कि सदाशिव रुद्र के पूजन से सभी देवताओं की पूजा स्वत: हो जाती है । "रूद्रहृदयोपनिषद" में शिव के बारे में कहा गया है कि-'सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका:' अर्थात् - सभी देवताओं की आत्मा में रूद्र उपस्थित हैं और सभी देवता रूद्र की आत्मा हैं ।

हमारे शास्त्रों में विविध कामनाओं की पूर्ति के लिए रुद्राभिषेक के पूजन के निमित्त अनेक द्रव्यों तथा पूजन सामग्री को बताया गया है। साधक रुद्राभिषेक पूजन विभिन्न विधि से तथा विविध मनोरथ को लेकर करते हैं । किसी खास मनोरथ की पूर्ति के लिये तदनुसार पूजन सामग्री तथा विधि से रुद्राभिषेक किया जाता है ।

रुद्रार्चन के पांच प्रकार हैं -

रुद्राभिषेक के विभिन्न पूजन के लाभ इस प्रकार हैं-
रुद्रा: पञ्चविधाः प्रोक्ता देशिकैरुत्तरोतरं ।
सांगस्तवाद्यो रूपकाख्य: सशीर्षो रूद्र उच्च्यते ।।
एकादशगुणैस्तद्वद् रुद्रौ संज्ञो द्वितीयकः ।
एकदशभिरेता भिस्तृतीयो लघु रुद्रकः।।

1- रूपक या षडंग पाठ = रुद्राष्टाध्यायी में कुल दस अध्याय हैं किन्तु नाम अष्टाध्यायी ही क्योंकि इसके आठ अध्यायों में भगवन शिव की महिमा व कृपा शक्ति का वर्णन है ।
शेष दो अध्याय शांत्यधाय और स्वस्ति प्रार्थनाध्याय के नाम से जाना जाता है । रुद्राभिषेक करते हुए इन सम्पूर्ण 10 अध्यायों का पाठ रूपक या षडंग पाठ कहा जाता है ।

प्रथम अंग शिव संकल्प सूक्त , द्वतीय अंग पुरुष सूक्त, तृतीय अंग उत्तर नारायण सूक्त , चतुर्थ अंग अप्रतिरथ इंद्र सूक्त , पंचम अंग सूर्य सूक्त , और रूद्र सूक्त सम्पूर्ण पांचवे अध्याय तक षष्ट अंग इस प्रकार षडंग पाठ बताया गया है ।

2- एकादशिनि रुद्री - षडंग पाठ में पांचवें और आठवें अध्याय के नमक चमक पाठ विधि यानि ग्यारह पुनरावृति पाठ को एकादशिनि रुद्री पाठ कहते हैं ।
पांचवें अध्याय में "नमः" शब्द अधिक प्रयोग होने से इस अध्याय का नाम नमक और आठवें अध्याय में "चमे" शब्द अधिक प्रयोग होने से इस अध्याय का नाम चमक प्रचलित हुआ । दोनों पांचवें और आठवें अध्याय पनरावृति पाठ नमक चमक पाठ के नाम से प्रसिद्धि मिली है ।

3- लघु रुद्र - एकादशिनि रुद्री के ग्यारह आवृति पाठ को लघु रूद्र कहते हैं ।

4- महारुद्र - लघु रूद्र की ग्यारह आवृत्ति पाठ को महा रूद्र कहा जाता है ।

5- महारुद्र की ग्यारह आवृति पाठ अतिरुद्र कहा जाता ।
ये दिव्य अनुष्ठान पाठात्मक, अभिषेकात्मक, हवनात्मक तीनों प्रकार से किये जाते हैं । शास्त्रों में इन दिव्य अनुष्ठानों की विशेष महिमा है और बड़े भाग्यशाली पुण्यात्माओं को ही इन्हें संम्पन् करने का अवसर प्राप्त होता है ।

रुद्राभिषेक में विविध कामनाओं की पूर्ती हेतु जल दूध आदि द्रव्य 
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जलेन वृष्टि माप्नोति व्याधि शान्त्यै कुशोदकै: ।

* जल से अभिषेक करने पर वर्षा होती है।
* असाध्य रोगों को शांत करने के लिए कुशोदक से रुद्राभिषेक करें।

दध्ना च पशु कामाय श्रिया इक्षु रसेन च । मध्वाज्येन धनार्थी स्यान्मुमुक्षुस्तीर्थ वारिणः ।।

* भवन-वाहन के लिए दही से रुद्राभिषेक करें।

* लक्ष्मी प्राप्ति के लिये गन्ने के रस से रुद्राभिषेक करें।

* धन-वृद्धि के लिए शहद एवं घी से अभिषेक करें।

* तीर्थ के जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
* पुत्र प्राप्ति के लिए दुग्ध से और यदि संतान उत्पन्न होकर मृत पैदा हो तो गोदुग्ध से रुद्राभिषेक करें।

* रुद्राभिषेक से योग्य तथा विद्वान संतान की प्राप्ति होती है।

* ज्वर की शांति हेतु शीतल जल/गंगाजल से रुद्राभिषेक करें।

* सहस्रनाम-मंत्रों का उच्चारण करते हुए घृत की धारा से रुद्राभिषेक करने पर वंश का विस्तार होता है।

* प्रमेह रोग की शांति भी दुग्धाभिषेक से हो जातीहै।

* शक्कर मिले दूध से अभिषेक करने पर जडबुद्धि वाला भी विद्वान हो जाता है।

* सरसों के तेल से अभिषेक करने पर शत्रु पराजित होता है।

* शहद के द्वारा अभिषेक करने पर यक्ष्मा (तपेदिक) दूर हो जाती है।

*पातकों को नष्ट करने की कामना होने पर भी शहद से रुद्राभिषेक करें।

* गो दुग्ध से तथा शुद्ध घी द्वारा अभिषेक करने से आरोग्यता प्राप्त होती है।

* पुत्र की कामनावाले व्यक्ति शक्कर मिश्रित जल से अभिषेक करें ।

ऐसे तो अभिषेक साधारण रूप से जल से ही होता है । परन्तु विशेष अवसर पर या सोमवार, प्रदोष और शिवरात्रि आदि पर्व के दिनों मंत्र गोदुग्ध से विशेष रूप से अभिषेक किया जाता है ।

विशेष पूजा में दूध, दही, घृत, शहद और चीनी से अलग-अलग अथवा सब को मिला कर पंचामृत से भी अभिषेक किया जाता है। 
तंत्रों में रोग निवारण हेतु अन्य विभिन्न वस्तुओं से भी अभिषेक करने का विधान है। इस प्रकार विविध द्रव्यों से शिवलिंग का विधिवत् अभिषेक करने पर अभीष्ट कामना की पूर्ति होती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी पुराने नियमित रूप से पूजे जाने वाले शिवलिंग का अभिषेक बहुत ही उत्तम फल देता है। किन्तु यदि पारद , स्फटिक , नर्मदेश्वर, अथवा पार्थिव शिवलिंग का अभिषेक किया जाय तो बहुत ही शीघ्र चमत्कारिक शुभ परिणाम मिलता है । रुद्राभिषेक का फल बहुत ही शीघ्र प्राप्त होता है ।

रुद्राभिषेक करने की तिथियां-
कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, पंचमी, अष्टमी, एकादशी, द्वादशी, अमावस्या, शुक्लपक्ष की द्वितीया, पंचमी, षष्ठी, नवमी, द्वादशी, त्रयोदशी तिथियों में अभिषेक करने से सुख-समृद्धि संतान प्राप्ति एवं ऐश्वर्य प्राप्त होता है।
कालसर्प योग, गृहकलेश, व्यापार में नुकसान, शिक्षा में रुकावट सभी कार्यो की बाधाओं को दूर करने के लिए रुद्राभिषेक आपके अभीष्ट सिद्धि के लिए फलदायक है। किसी कामना से किए जाने वाले रुद्राभिषेक में शिव-वास का विचार करने पर अनुष्ठान अवश्य सफल होता है और मनोवांछित फल प्राप्त होता है। 
शिव वास कब कहाँ 
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प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी, अमावस्या तथा शुक्लपक्ष की द्वितीया व नवमी के दिन भगवान शिव माता गौरी के साथ होते हैं, इस तिथिमें रुद्राभिषेक करने से सुख-समृद्धि उपलब्ध होती है।
कृष्णपक्ष की चतुर्थी, एकादशी तथा शुक्लपक्ष की पंचमी व द्वादशी तिथियों में भगवान शंकर कैलाश पर्वत पर होते हैं और उनकी अनुकंपा से परिवार मेंआनंद-मंगल होता है।
कृष्णपक्ष की पंचमी, द्वादशी तथा शुक्लपक्ष की षष्ठी व त्रयोदशी तिथियों में महादेव नंदी पर सवार होकर संपूर्ण विश्व में भ्रमण करते है।अत: इन तिथियों में रुद्राभिषेक करने पर अभीष्ट सिद्ध होता है। 
कृष्णपक्ष की सप्तमी, चतुर्दशी तथा शुक्लपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी, पूर्णिमा में भगवान महाकाल श्मशान में समाधिस्थ रहते हैं। 
अतएव इन तिथियों में किसी कामना की पूर्ति के लिए किए जाने वाले रुद्राभिषेक में आवाहन करने पर भगवान शिव की साधना भंग होती है, जिससे अभिषेककर्ता पर विपत्ति आ सकती है।

कृष्णपक्ष की द्वितीया, नवमी तथा शुक्लपक्ष की तृतीया व दशमी में महादेव देवताओं की सभा में उनकी समस्याएं सुनते हैं।

इन तिथियों में सकाम अनुष्ठान करने पर संताप या दुख मिलता है।

कृष्णपक्ष की तृतीया, दशमी तथा शुक्लपक्ष की चतुर्थी व एकादशी में सदाशिव क्रीडारत रहते हैं।

इन तिथियों में सकाम रुद्रार्चन संतान को कष्ट प्रदान करते है।

कृष्णपक्ष की षष्ठी, त्रयोदशी तथा शुक्लपक्ष की सप्तमी व चतुर्दशी में रुद्रदेव भोजन करते हैं।

इन तिथियों में सांसारिक कामना से किया गया रुद्राभिषेक पीडा देते हैं।

ज्योर्तिलिंग-क्षेत्र एवं तीर्थस्थान में तथा शिवरात्रि-प्रदोष, श्रावण के सोमवार आदि पर्वो में शिव-वास का विचार किए बिना भी रुद्राभिषेक किया जा सकता है।

वस्तुत: शिवलिंग का अभिषेक आशुतोष शिव को शीघ्र प्रसन्न करके साधक को उनका कृपापात्र बना देता है और उनकी सारी समस्याएं स्वत: समाप्त हो जाती हैं।

अतः हम यह कह सकते हैं कि रुद्राभिषेक से मनुष्य के सारे पाप-ताप धुल जाते हैं।

स्वयं श्रृष्टि कर्ता ब्रह्मा ने भी कहा है की जब हम अभिषेक करते है तो स्वयं महादेव साक्षात् उस अभिषेक को ग्रहण करते है।
विधिवत रुद्राभिषेक हेतु हमारे संस्थान में संपर्क करें

- आचार्य भगवती कृष्ण सेमवाल
9464612003