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।।ज्योतिष माहात्म्य ।।
वेदेषु विद्यासु च ये प्रदिष्टा 
धर्मादयः काल विशेषतोSर्था: ।
ते सिद्धि मायान्त्यखिलाश्च येन 
तद् वेद नेत्रं जयतीह लोके ।।
अर्थ - वेदों में तथा अन्य विद्याओं में काल विशेष पर आधारित जो धर्म कर्मादि निर्दिष्ट हैं वे सभी जिस विद्या के प्रभाव से सिद्ध होते हैं वेद के नेत्र स्वरुप उस ज्योतिष शास्त्र की इस संसार में जय हो 
-(महर्षि आर्ष्टिषेणि, ज्योतिर्निबन्ध )
 
मानव जीवन हेतु अमूल्य वरदान ज्योतिष शास्त्र 
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वेदों के छ अंग कहे गये हैं -
1-शिक्षा ,2-कल्प,3- व्याकरण ,4-निरुक्त, 5-छंद तथा 6-ज्योतिष इन्हें षड् वेदांग की संज्ञा प्राप्त है वेदों का पूर्ण ज्ञान प्राप्ति हेतु इन छ: अंगों की अपनी विशेषता है ।
मन्त्रों के उचित उच्चारण के लिए "शिक्षा " का ,
कर्मकाण्ड और यज्ञीय अनुष्ठान के लिए "कल्प" का,
शब्दों के रूप ज्ञान के लिए "व्याकरण" का,
अर्थ ज्ञान के निमित्त शब्दों के निर्वचन के लिए "निरुक्त" का, वैदिक व छंदों के ज्ञान के लिए "छंद"का , और सुभाशुभ कर्मों के ज्ञान व पूर्व कर्मों के दोष शमन,उज्जवल भविष्य निर्माण हेतु प्रायश्चित्त अनुष्ठानों के काल मुहूर्त निर्णय एवं चराचर सृष्टि के तिथि काल ऋतु मास वर्ष ग्रहण अयन संवत्सर युग मन्वन्तर ग्रह की समस्त गणना हेतु "ज्योतिष" मान्य है । 
भारतीय संस्कृति का मूल आधार वेद है, वेद से ही हमें अपने धर्म और सदाचार का ज्ञान प्राप्त होता है ।
हमारी सनातन संस्कृति की पारिवारिक सामजिक वैज्ञानिक एवं दार्शनिक विचारधाराओं के स्रोत वेद ही हैं भारतीय विद्याएँ वेदों से ही प्रकट हुयी हैं ।
इसलिए महर्षि पाणनि ने ज्योतिष को वेद पुरुष भगवान का नेत्र कहा है "ज्योतिषः वेदानां चक्षु:" । जिस प्रकार मनुष्य बिना चक्षु इन्द्रिय (नेत्र) के किसी वस्तु का दर्शन करने में असमर्थ होता है ठीक वैसे ही वेद शास्त्र या वेद विदित कर्मो को जानने के लिए ज्योतिष का अन्यतम महत्व सिद्ध है । इसमें आज के तथा कथित तर्कविदों के प्रमाण की आवश्यकता नहीं है । 
ज्योतिष शास्त्र अपने आप में महान था महान है और महान रहेगा, उल्लूक को सूर्य नहीं दिखाई दे तो उसमें सूर्य का क्या दोष जो लोग ज्योतिष के विषय में निरर्थक तर्क या विरोध करते हैं ये उनका दुर्भाग्य है जो अपने महान ऋषि मुनियों द्वारा सिंचित इस ज्योतिष कल्प तरु के लाभ से वंचित एवं विमुख हैं । 
क्योकि ऐसे लोगों का जन्म अपने प्ररब्धानुसार सत्य का विरोध करने व परिणामस्वरूप जन्मजन्मान्तरों के दुःख प्राप्ति के लिए ही होता है ।अस्तु ।
ज्योतिष शास्त्र अनादि काल से ही जनमानस के लिए अत्यंत उपयोगी रहा है और आज भी ज्योतिष पूर्ण सार्थक है यह ज्योति स्वरूप है ।
ज्योतिष जीवन के अन्धकारमय राहों पर भटके हुए मनुष्यों के लिए दिव्य प्रकाश पुंज है, जो जीवन पथ को अलौकिक प्रकाश से प्रकाशित कर देता है ।
प्रातः उठने से लेकर शयन प्रयन्त की दिनचर्य्या ,गर्भ से लेकर मृत्यु पर्यन्त की सम्पूर्ण जीवनचर्य्या ,भविष्य की बातें परलोक -पुनर्जन्म भूतकाल की समस्त स्थिति को ज्योतिष अभिव्यक्त करता है । 
प्राचीन काल में त्रैकालिक प्रभाव, भूगर्भ ,भूतल ,अंतरिक्ष का यथार्थ ज्ञान ज्योतिष की कृपा से ही संभव था जब विज्ञान इतना उन्नत नहीं था और आज भी है और सदा रहेगा क्योंकि यह वेदांग है ।
यह ज्योतिष वेद नेत्र है कोई मानव के समान सामान्य नेत्र नहीं जिसमें भ्रम लिप्सा प्रमाद आदि के कारण दृष्टि दोष हो जाने से यथार्थ ज्ञान भी मिथ्या लगता है। ज्योतिष वेद पुरुष का ऐसा नेत्र है एक ऐसी दिव्य दृष्टि है जिस दृष्टि से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और समस्त जीवनिका का प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष, व्यवहित अव्यवहित समस्त कर्म हस्तामलकवत् स्पष्ट दृग्गोचर होने लगता है ।
जैसे शरीर में कर्ण नासिका आदि अन्य अंगों के अविकल विद्यमान रहने पर भी नेत्र के न रहने पर व्यर्थता प्रतीत होती है व्यक्ति कुछ भी करने में असमर्थ हो जाता है वैसे ही नेत्र रुपी ज्योतिष शास्त्र के बिना वेद की अपूर्णता ही रहती है ।
ज्योतिष शास्त्र लौकिक पारलौकिक सभी कार्यों के लिए मुहूर्त निर्धारित करता है और और एक सही मुहूर्त में किया गया कार्य अवश्य सिद्ध होता है वर्तमान में मंगल यान की सफलता के पीछे सही मुहूर्त चुनाव और निर्विघ्नता हेतु आवश्यक पूजा सर्व विदित है ।
सप्ताह के दिनों के नामकरण रविवार, सोमवार, मंगलवार आदि वारों का नामकरण कोई मन गढ़ंत नहीं है यह भारतीय मनीषा की अभूतपूर्व देन है जिसके लिए समस्त विश्व भारत का ऋणी है 
अथर्ववेद के अथर्वज्योतिष में वारों के नाम एवं क्रम स्पष्ट है --
आदित्यः सोमो भौमश्च तथा बुध वृहस्पति: ।
भार्गवः शनैश्चरश्चैव एते सप्त दिनाधिपः ।।
यानि -रवि,सोम,मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र और शनिवार ये सप्ताह के सात वार हैं ।
जिनका नामकरण संस्कार भारत में हुआ शेष विश्व ने भारत से तत् संबंधी ज्ञान प्राप्त किया है ।
ज्योतिष शास्त्र प्रारब्ध और 
जन्मान्तरीय शुभाशुभ का ज्ञान कराकर भविष्य को उज्जवल बनाने की दृष्टि देता है ।और वर्तमान को सुधारने का परामर्श देता है ।
ज्योतिष के तीन अंग हैं 1- सिद्धांत --
यानि गणना ,सौर सावन नाक्षत्र चांद्र आदि भेदों का निरूपण ,ग्रहों की मार्गी वक्री उच्च नीच उत्तर दक्षिण आदि गतयों का वर्णन ,अधिमास क्षय मास प्रभवादि संवत्सर नक्षत्रों का भ्रमण आदि गणना ।
2- संहिता --
ज्योतिष का मुख्य विषय ही संहितास्कंध है अथवा सिद्धान्त और संहिता का मिश्रण है यह सार्व भौम है यानि गणित और फलित का मिश्रण रूप है ।संहिता स्कंध संबंधी साहित्य बहुत विशाल है वराह मिहिराचार्य ने अपनी वृहत्संहिता में अपने पूर्व वर्ती कश्यप, गर्ग,पराशर, असित, देवल ,भृगु, वशिष्ठ ,वृहस्पति आदि अनेक साहित्यकारों का उल्लेख किया है जिन्होंने संहिता पर विस्तृत विवेचन किया 
3-होरा -सुख दुःख इष्ट अनिष्ट आदि सभी शुभाशुभ विषयों का विवेचन होरा स्कन्ध में है 
होरा शब्द की व्युत्पत्ति अहोरात्र पद से पूर्वा पर वर्ण के लोप से होती है इस स्कंध में राशियों के स्वरूप वर्णन ग्रहों की उच्च नीच दृष्टि मित्र शत्रु बलाबल द्वादश भावों द्वारा विचारणीय विषय होरा द्रेष्काण नवमांश आदि का विवेचन दशाएं गोचर विचार विवाहादि संस्कारों मुहूर्तों का विचार है
होरा स्कंध की ताजिक शाखा में केशवीय जातक हायनरत्न ताजिक नीलकंठी आदि प्रमुख ग्रन्थ हैं । 
प्रश्न तंत्र में प्रश्न सार भुवनदीपक केरलमतम् आदि ग्रन्थ हैं ऐसे ही सामुद्रिक शास्त्र रमल स्वरोदय शास्त्र तथा स्वप्न विद्या पर भी अनेक ग्रन्थ हैं जो मानव जीवन के लिए अमूल्य वरदान हैं ।
अतः जब भी जीवन में असमंजसता द्विविधा लगे तो निसंकोच ज्योतिष परामर्श लेकर अपना जीवन पथ प्रशस्त करें । ॐ ।